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सिर्फ किस्मत : सब्सिडी में 20% से अधिक गिरावट की संभावना

अमित भंडारी,

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खाद्य, ईंधन और उर्वरक:यह तीनों ही  सब्सिडी एक संतुलित बजट पेश करने की कोशिश कर रहे हर  भारतीय वित्त मंत्री के लिए बार बार आने घटने वाले दुःस्वप्न के समान हैं।

 

पिछले साल के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तीनों प्रमुख सब्सिडी के लिए  2.51 लाख करोड़ रुपये (सिर्फ 40 अरब डॉलर) अलग से निर्धारित किए थे । इसकी तुलना में, रक्षा बजट के लिए कुल आवंटन केवल 2.29 लाख करोड़ रुपये (लगभग $ 37बिलियन)  था।

 

जेटली को फिलहाल आराम की साँस लेनी चाहिए। इन तीनों  सब्सिडी में से दो – ईंधन और उर्वरक – में 28 फरवरी को प्रस्तुत किए जाने वाले आगामी बजट में सम्भवतः कुछ गिरावट दिखनी चाहिए ।  पिछले साल के मुकाबले कम से कम 20% तक की इस गिरावट की वजह पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कमी आना है।

 

तालिका 1: 2014-15 बजट में मेजर सब्सिडी आइटम (करोड़ रुपए)

सब्सिडी वित्त वर्ष 13(वास्तविक) वित्त वर्ष 14(संशोधित) वित्त वर्ष 15(बजट)
खाद्य सब्सिडी 85,000 92,000 115,000
ईंधन सब्सिडी 96,880 85,480 63,427
उर्वरक सब्सिडी 65,613 67,972 72,970

Source: IndiaSpend Research

 

खाद्य सब्सिडी

 

खाद्य सब्सिडी,  खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा नियंत्रित होती है जो उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंतर्गत आता है। यह विभाग लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) और अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) जैसी  योजनाओं के लिए ज़िम्मेदार है।

 

अंत्योदय अन्न योजना के तहत ये परिवार  35 किलोग्राम प्रति माह की दर से खाद्यान्न  खरीद सकते हैं – चावल 3 रुपये / किलो, गेहूं  2 रुपये / किलो और मोटा अनाज 1 रुपये / किलो की दर से ले सकते हैं । लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मामले में राज्य सरकारें , परिवहन प्रभार, थोक/खुदरा विक्रेता के लिए मार्जिन आदि रखने के बाद कुछ अधिक दामों पर अनाज बेच सकते हैं। अभी तक गरीबी रेखा से नीचे के 6.52 करोड़ परिवार ही  लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत आते हैं और इनमे से 38% परिवार अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आते हैं।

 

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013, का उद्देश्य पात्र (गरीब) व्यक्तियों को रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराना है । इस अधिनियम में अखिल भारतीय स्तर पर, 75% ग्रामीण आबादी और 50% शहरी आबादी को कवर करने  का प्रावधान है

 

जाहिर तौर पर , चावल, गेहूं और मोटे अनाजों की कीमतें  उन  कीमतों की तुलना में कहीं अधिक हैं जिन पर वे गरीबों को बेचे जा रहे हैं। सब्सिडी राशि इसी अंतराल को भरने के लिए है -किसान को भुगतान की गई कीमत बनाम गरीबों से वसूल की गई कीमत। वित्त वर्ष 15 के लिए, सरकार ने विभिन्न खाद्य सब्सिडी शीर्षों के अंतर्गत 1.15 लाख करोड़  रुपये का प्रावधान रखा था ।

 

सस्ते भोजन पर कटौती करने में होने वाली राजनीतिक कठिनाइयों को देखते हुए, इस राशि में आगामी बजट में वृद्धि की संभावना है।

 

ईंधन सब्सिडी

 

भारत ने वित्त वर्ष के दौरान, डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस, मिट्टी का तेल, उड्डयन ईंधन और नाफ्था के रूप में 158 लाख टन पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग किया है । तीन उत्पाद – डीजल, रसोई गैस और मिट्टी का तेल – ही कुल खपत के  58% भाग के लिए जिम्मेदार है।

 

इन तीन उत्पादों को आधिकारिक तौर पर ‘संवेदनशील’  घोषित किया गया है और देखा जाए तो अब तक यह उत्पादन की लागत से कम कीमत पर बेचे गए हैं । वित्त वर्ष 14 के दौरान, भारत की तेल विपणन कंपनियों – भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और इंडियन ऑयल – को लागत से कम कीमत पर डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की बिक्री करने के कारण  139,869 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है ।

 

इस नुकसान की  आंशिक रूप सरकार ने  तेल कंपनियों को  80,772 करोड़ रुपये का भुगतान कर के भरपाई कर  दी थी । वित्त वर्ष 15 के लिए, सरकार ने बजट में  57,336 करोड़ रुपये जैसा कम भुगतान का प्रावधान किया था । सौभाग्य से एफएम ( वित्त मंत्री )  के लिए, पिछले कुछ महीनों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेजी से गिरावट आई  जिसका अर्थ है कि  अगले साल सब्सिडी की रकम (के आंकड़े) पहले से काफी कम होने की संभावना है ।

 

वित्त वर्ष 14 के दौरान,  विपणन कंपनियों को हुए  कुल नुकसान के 45% भाग के लिए डीजल तेल जिम्मेदार है। लेकिन  क्योंकि पेट्रोलियम की कीमतों में गिरावट आने से डीजल के उत्पादन की लागत में गिरावट आई है तो अब तेल कंपनियों को इससे लाभ होगा।

 

रसोई गैस और मिट्टी के तेल में भी घाटा तेजी से गिरा है । 1 फ़रवरी 2015 को, तेल विपणन कंपनियों को मिट्टी के तेल की बिक्री पर 13.32 / लीटर रुपये और रसोई गैस से 139.23 / सिलेंडर का घाटा हो रहा था । 1 अप्रैल 2014 को , यह आंकड़े क्रमश: 34.43 / लीटर रुपये और 506.06 / सिलेंडर थे।

 

इन नंबरों से यह संकेत मिलता है कि पेट्रोलियम सब्सिडी चालू वित्त वर्ष के दौरान कम होती जाएगी। यदि पेट्रोलियम की कीमतें अपने मौजूदा स्तर के आसपास बनी रहती हैं तो यह सब्सिडी इतना सिरदर्द नहीं रहेगी ।

 

रसोई गैस और मिट्टी का तेल  खाना पकाने का ईंधन रहे हैं और इनकी कीमतें बढ़ना राजनीतिक रूप से एक विनाशकारी कदम माना जाता है। डीजल सड़क परिवहन के लिए इस्तेमाल होता है  और अन्य वस्तुओं की कीमतों पर इसका प्रभाव पड़ता है इसलिए इसमें इतनी तीव्रता से बढ़ोतरी संभव नहीं हैं। इसलिए कच्चे तेल की कीमतें यदि वापिस बढ़ती हैं – जैसा की  अंततःहोना ही है , तीन महीने या तीन साल के बाद  – यह सब्सिडीज़  पुनः वापस आएंगी।

 

उर्वरक (फर्टिलाइजर) सब्सिडी

 

भारत की खाद्य जरूरतों  और जीवन के लिए कृषि पे निर्भर 600 करोड़ की आबादी को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उर्वरक कृषि के लिए एक महत्त्वपूर्ण इनपुट(निवेश) है । उर्वरक की कीमतें  भी खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित करती हैं। इसलिए, सरकार उर्वरक बिक्री पर भी सब्सिडी देती है ।

 

कृषि में उर्वरक के रूप में  तीन बड़े आदानों, जिन्हे एन-पी-के (नाइट्रोजन, फास्फेट और पोटेशियम) भी कहा  जाता है, की आवश्यकता होती  है। वित्त वर्ष 14 के दौरान, भारत में 23.95 मिलियन टन उर्वरक की खपत हुई जिसमे नाइट्रोजन उर्वरक जैसे यूरिया कुल खपत के 69% भाग के लिए जिम्मेदार है।

 

सौभाग्य से, फिर से, एफएम(वित्त मंत्री ) के लिए यूरिया उत्पादन के लिए पेट्रोलियम उत्पादों- प्राकृतिक गैस या नेफ्था- के इनपुट (निवेश) की आवश्यकता होती है। नेफ्था कच्चे तेल से निकला जाता है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  पेट्रोलियम की कीमतों में गिरावट आने से नाइट्रोजन उर्वरक की कीमतों में भी गिरावट आनी चाहिए जिससे सब्सिडी भी कम हो सकती है । सभी पौधे नाफ्था का उपयोग नही करते ; कुछ प्राकृतिक गैस का भी उपयोग करते हैं जिसकी कीमतें एक अलग  ही समीकरण से प्रभावित होती हैं ।

 

भारत में व्यापक गरीबी – आधिकारिक तौर पर लगभग  270 मिलियन गरीब हैं – और राजनीतिक वास्तविकताओं को देखते हुए इन सब्सिडी को  तुरंत खारिज किया जा सके ऎसी कोई संभावना नहीं है।

 

लेकिन यह ज़रूर किया जा सकता है, कि लाभ को  व्यर्थ और निस्राव (रिसाव)  से बचाने के लिए अंतिम उपभोक्ताओं को सीधे लक्षित करना चाहिए। सरकार कुछ ऐसी ही कोशिश कर रही है आधार द्वारा जो की एक राष्ट्रव्यापी  विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण प्रणाली है।

 

(अमित भंडारी, एक मीडिया, अनुसंधान और वित्त पेशेवर हैं । उन्होंने  आईआईटी-बीएचयू से  बी-टेक और आईआईएम-अहमदाबाद से एमबीए किया  है। आप उनसे amitbhandari1979@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं। )

 

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