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स्वास्थ्य संकट में पैसे की ज़रूरत -लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं

प्राची साल्वे,

 

वैश्विक रोग बोझ का 21% भार ,भारत वहन करता है और अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम 6%, अकाल मृत्यु और निवारणीय बिमारियों में नष्ट कर देता है ।

 

हर एक सूचक गंभीर है। भारतीयों बच्चों  में मृत्यु का प्रमुख कारण – बचपन में होने वाले दस्त और निमोनिया-के 90 % उपचार गलत हैं और 2012 में पांच साल की उम्र से कम 1,000 बच्चों में से 56 बच्चों का निधन हो गया।

 

यह स्पष्ट है कि  12 वीं योजना (2012-2017) के दौरान प्रस्तावित 1.93 लाख करोड़ रुपये और सकल घरेलू उत्पाद का 1.3% (जीडीपी) और प्रस्तावित रुपये  ($ 31 बिलियन) के  अपने  मौजूदा खर्च की तुलना में भारत को स्वास्थ्य देखभाल पर इससे बहुत अधिक खर्च करना चाहिए।

 

लेकिन यह अभी इतना भी स्पष्ट नहीं है

 

कई अध्ययनों ने इस तथ्य की ओर इशारा किया है कि  स्वास्थ्य परिणामों  का बढ़ते व्यय से ज़रूरी नहीं  कोई संबंध हो , जिसके कारण  द हिंदू में कुछ इस तरह की टिप्पणी भी आई थी कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2015 का मसौदा महज  ” एक लाश पर मरहम ” लगाने  जैसा है।

 

उदाहरण के लिए, इस अध्ययन में यह उल्लेख किया गया है कि  , 17 राज्यों में से सात,  और अधिक व्यय की अपेक्षा अपनी कुशलता में वृद्धि कर के , और बेहतर कार्य कर सकते हैं ।

 

भारत की तुलना में गरीब देश ,बांग्लादेश और हैती अपने सकल घरेलू उत्पाद का अधिक भाग , क्रमश: 3.6% और 6.4%, इस पर खर्च करते हैं।

 

लेकिन कई गरीब, बड़े भारतीय राज्यों में, चिकित्सा कर्मियों की कमी है और कई विशाल क्षेत्रों में कोई स्वास्थ्य सेवा नही है इसलिए जहाँ व्यय कौशल में सुधार होना चाहिए, वहीं  इन मामलों में, अधिक व्यय करना भी महत्वपूर्ण है।

 

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने ,जो 28 फरवरी को अपना पहला परिपूर्ण बजट घोषित करने के लिए तैयार है, अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि वह स्वास्थ पर सकल घरेलू उत्पाद के 3% तक व्यय बढ़ा देगी।

 

हम पिछले तीन वर्षों में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग पर बजट परिव्यय को देखते हैं ।

 

योजना परिव्यय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का व्यय वित्त वर्ष  2013- वित्त वर्ष 2015 (करोड़ रुपए)

 

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Source: Ministry of Health and Family Welfare

 

विभाग के लिए योजना व्यय में अनुमोदित परिव्यय 2014-15 में 27,127 करोड़ रुपये से  2012-13 में 30,645 करोड़ रुपये तक की वृद्धि हुई है  , लगभग   13% तक की वृद्धि । वास्तविक व्यय में 7.5%  तक वृद्धि हुई , यह  2012-13 में 22,469 करोड़ रुपये  (अनुमोदित परिव्यय में से  77% के उपयोग) से 2013-14 में  20,908 करोड़ रुपये(77% के  उपयोग) तक बढ़ गया है।

 

देश भर में स्वास्थ्य परिणामों में  पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है। शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में गिरावट आई है। हालांकि, राज्यों के बीच व्यापक असमानताऐं  हैं।

 

चयनित राज्यों में  शिशु मृत्यु दर, 2011-2013 (प्रति 1000 जीवित जन्मों पर मृत्यु )

 

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Source: Lok Sabha

 

समग्र शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 2011में – प्रति1000 जीवित जन्मों पर 44 मृत्यु से गिर कर  2013 में 40 हो गई है ।

 

असम और मध्य प्रदेश में  प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 54 मृत्यु के साथ उच्चतम शिशु मृत्यु दर थी, लाइबेरिया और घाना के समान ।

 

मातृ मृत्यु अनुपात, 2007-2012 (प्रति 1000 जीवित जन्मों पर मृत्यु )

 

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Source: Lok Sabha

 

अखिल भारतीय मातृ मृत्यु अनुपात में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 212 से वर्ष 2012 में 178 तक गिरावट आई है । असम में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 328 मृत्यु के साथ उच्चतम एमएमआर है जिसके बाद उत्तर प्रदेश है जहाँ 2012 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 292 मृत्यु हुई जो रवांडा में 320 और  भूमध्यरेखीय गिनी में 290 से अधिक है।

 

परिणामों में असमानता का  मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवा की आधारिक संरचना का असमान वितरण है।

 

राज्य के अंतर्गत चलने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसी) जो ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करते हैं दरअसल अनिवार्य रूप से एकल चिकित्सक क्लीनिक हैं जिनमे आमतौर पर मामूली सर्जरी की सुविधा होती है।  सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) 80,000 से ले कर 120000 की आबादी को कवर करते हुए चार प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए रेफरल केंद्र के रूप में काम करते हैं ।

 

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार 8760 तक (24,448 राष्ट्रव्यापी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का लगभग 36.4%) पीएचसी फिलहाल देश भर में 24 × 7 घंटे स्वास्थ  सेवाएँ  प्रदान कर रहे हैं । हालांकि, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या 24% और  सीएचसी की संख्या 33%  कम होने के कारण  भारत भर में स्वस्थ सेवा केन्द्रों की संख्या में भारी कमी  है।

 

भारत में स्वास्थ्य केंद्रों में कमी

 

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Source: Ministry of Health and Family Welfare

 

हम अब भारत भर में इन केन्द्रों पर चिकित्सकों की उपलब्धता पर एक नजर डालते हैं।

 

समुदायिक (बाएं) और प्राथमिक(दाएं) स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टरों की कमी 

 

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Source: Ministry of Health and Family Welfare

 

पूरे भारत में, पीएचसी में 25%  और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 67% डॉक्टरों क़ी कमी है।

 

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में क्रमश: 51% और 40%  डॉक्टरों की कमी है। इन राज्यों में सीएचसी में रिक्ति इससे भी कहीं अधिक है क्रमश: 77%, 75% और 73%।

 

बुनियादी सुविधाओं पर व्यय, जिससे पीएचसी / सीएचसी के निर्माण और डॉक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ के वेतन का खर्च निकलता है, में  पिछले दो वर्षों में गिरावट आई है।यह बजट के 23%  भाग से वर्ष 2014-15 में 15% तक गिरा है ।

 

अतः चुनौती यह रहेगी कि  कैसे स्वास्थ्य की आधारिक संरचना पर व्यय में वृद्धि लाई  जाए , स्वस्थ परिणामों  के संदर्भ में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच की खाई को कम किया जाए , संक्रामक रोगों के प्रसारको रोकने पर ध्यान केंद्रित किया जाए और सब से ऊपर, स्वास्थ्य खर्च में अधिक से अधिक कुशलता ले जा सके।  28 फरवरी को हम इन्हीं कुछ जवाबों का इंतजार करेंगे।
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