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100% गलत : ग्रामीण मेडिकल स्टाफ ने डायरिया को भी जानलेवा बना दिया

समर हलर्नकर,

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एक ने अध्ययन के अनुसार भारतीय बच्चों में मृत्यु का प्रमुख कारण बचपन में लगने वाले दस्त और निमोनिया के लिए उपचार के तरीकों में से 90% तरीके गलत हैं ।

 

जामा बाल रोग (पेडियाट्रिक्स)  (जामा से तातपर्य है अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक जर्नल)में हाल ही में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार अधिकतर  अयोग्य चिकित्सक, अपेक्षाकृत सरल जीवन रक्षक दवाओं की जानकारी ना होने की वजह से उनकी जगह एंटीबायोटिक दवाएँ  और अन्य हानिकारक दवाएँ लिख देते हैं।

 

“हमारे नमूने में प्रदाताओं में से केवल 20% में ही चिकित्सा योग्यता थी ,”  एक प्रमुख लेखक और  ड्यूक विश्वविद्यालय के सैनफोर्ड स्कूल में सार्वजनिक नीति के प्रोफेसर,मनोज मोहनन, ने इंडिया स्पेंड के साथ एक साक्षात्कार में  कहा। “हालांकि, यह भी महत्त्वपूर्ण है कि  हम ध्यान दे  कि  यह इस ग्रामीण परिस्थिति  में कोई असामान्य बात नहीं है।”

 

यह परिणाम इंगित करते हैं कि भारत में बाल मृत्यु दर जो विश्व में उच्चतर श्रेणी में आती है  उसे कम करने के लिए भारत जिन नीतियों को अपनाता रहा है अब तक उनके पुनर्मूल्यांकन और  संशोधन करना आवश्यक हो गया है।

 

इस 2014 के अध्ययन के अनुसार 15 उच्च बोझ वाले देशों में , भारत नीचे से तीसरे स्थान पर आता हैं जहां जीवन रक्षक हस्तक्षेप के लिए अपने जा रहे तरीकों  से डायरिया और निमोनिया से मरने सबसे अधिक खतरा है। 2013 में डायरिया और निमोनिया से मरने वाले  पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या 318,000 मौतों के साथ सबसे अधिक रही।

 

ड्यूक अध्ययन में बिहार के 340 स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को शामिल किया गया : जहां  भारत में एक से  चार साल के बीच की उम्र वाले बच्चों की उच्चतम मृत्यु दर है,  प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 55 मृत्यु होती हैं ।

 

इंडिया स्पेंड ने  अपनी पहली रिपोर्ट में बताया था कि भारत में बाल मृत्यु दर में पिछले 24 वर्षों में 55% की गिरावट आई है, लेकिन अभी भी बहुत बच्चे  मर जाते हैं। भारत अपने गरीब पड़ोसियों बांग्लादेश और नेपाल सहित दुनिया के कई देशों से  (चार्ट देखें), बहुत पीछे है।

 

चुनिंदा देशों के लिए बाल मृत्यु दर (प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 5 से कम उम्र में मृत्यु )

 

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Source: World Bank

 

जिन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया उन्होंने जिन्हे  “मानकीकृत रोगियों” और “विगनेट्स” कहा जाता है,  के माध्यम से चिकितसकों का मूल्यांकन किया है।

 

शब्दचित्र साक्षात्कार किसी परिकल्पित मामले का इलाज कैसे किया जाएगा के अनुसार चिकितसकों का आकलन करते हैं  । मानकीकृत रोगी, जो विगनेट्स में कल्पित लक्षणों के अनुसार रोगी बनते हैं उन्होंने गुप्त रूप से चिकित्सकों से भेंट की ।

 

यह दृष्टिकोण चिकित्सक कितना जानते हैं और कितना उस जानकारी को इस्तेमाल करते हैं के बीच के अंतर जिसे “नो-डू  गैप ”  को मापने में मदद करता है ।

 

यह नो-डू  गैप काफी अधिक प्रतीत होता है ।  चाहे प्रशिक्षित थे या नहीं लेकिन इस अध्ययन में जांच किए गए चिकित्सकों का प्रदर्शन साक्षात्कार में काफी बुरा था और उनके द्वारा किए गए कार्यों  में उससे भी अधिक बदतर (नीचे चार्ट देखें)।

 

डायरिया निदान के लिए  सही प्रश्न पूछने वाले चिकित्सकों की प्रतिशत %

 

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Source: JAMA Pediatrics

 

जामा पीडियाट्रिक्स में  जार्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय में विश्व स्वास्थ्य विभाग के अध्यक्ष जेम्स टीलश्च, द्वारा लिखे एक संपादकीय के अनुसार ” 10% से कम चिकित्सक [नीचे चार्ट देखें] पतले डीएसटी और निमोनिया के लिए सही इलाज या परामर्श देते हैं और एक गंभीर अनुपात में उन्होंने  अनुचित और संभावित खतरनाक दवाइयाँ बहुत अधिक संख्या में निर्धारित मानकीकृत रोगियों के लिए लिखीं  ।

 

डायरिया के लिए सही निदान या उपचार करने वाले चिकित्सकों का प्रतिशत %

 

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Source: JAMA Pediatrics

 

मोहनन कहते है ” सिर्फ दस्त के लिए केवल एक ही साधारण उपचार काफी है जो है ओआरएस  (मौखिक पुनर्जलीकरण लवण) और ज़िंक (जस्ता),किसी भी  एंटीबायोटिक दवाओं या अन्य हानिकारक दवाओं  के बिना लेकिन  [उनमे से किसी एक ने भी ]  प्रदाताओं ने सही उपचार नही दिया” ।

 

डमी (नकली) रोगियों में से किसी ने  भी एंटीबायोटिक दवाओं या अन्य दवाएँ  माँगी  नहीं  थी।

 

केवल 17% चिकित्सक ने (ओआरएस) दिया, जो एक कम लागत, आसानी से उपलब्ध  और एक प्रभावी उपचार है , हालाँकि 72% ने कहा कि ओआरएस का इस्तेमाल करेंगे -लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से उसका उपयोग नहीं किया।

 

इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार , जिन चिकित्सकों  ने ओआरएस  दिया भी उन्होंने भी साथ में हानिकारक या अनावश्यक दवाइयाँ जैसे एंटीबायोटिक (नीचे चार्ट देखें) भी दी , जिनके प्रति प्रतिरोध भारत भर में फैल रहा है और लाखों जाने खतरे में डाल रहा है।

 

प्रत्येक डायरिया उपचार करने वाले चिकित्सकों  का प्रतिशत %

 

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Source: JAMA Pediatrics

 

तो क्यों इतने सारे चिकित्सा प्रदाता एंटीबायोटिक्स लिखते  हैं ? इसका कारण स्पष्ट नहीं है।

 

“वे इस, जब वे  क्यों, एक कठिन सवाल है।” मोहनन ने कहा। ” फिलहाल  हम अनुवर्ती अध्ययन में इसी  मुद्दे का विशेष रूप से अध्ययन कर रहे हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि  उनमें से  बहुत दवाओं की बिक्री से पैसे कमाने के लिए ऐसा करते हैं (क्योंकि ग्रामीण परिवेश में चिकित्सा परामर्श का बाज़ार नहीं  है , रोगी  ‘इलाज’ के लिए तो भुगतान करने के लिए तैयार हो सकता है लेकिन सिर्फ चिकित्सा सलाह के लिए भुगतान नही करेगा । ”

 

प्रचुर मात्रा में  एंटीबायोटिक दवाएँ  लिखने का एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि  प्रदाताओं को अंदाज़ ही नही है कि  दवा के प्रति प्रतिरोध पैदा हो सकता है या मरीजों पर लंबी अवधि तक इस्तेमाल से प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा या उन्हें लगता है कि एंटीबायोटिक के उपयोग पर दिए गए दिशा निर्देशों का प्रभाव स्थानीय परिस्थितियों के लिए प्रभावी रूप से लागू नहीं होता है।

 

मोहनन ने कहा कि  ” हमे उम्मीद है कि  हमारे पास आने वाले वर्षों में इस विषय पर और अधिक अनुभवजन्य प्रमाण होंगे “।

 

क्योंकि यह अध्ययन बिहार में किया गया था, क्या इसके निष्कर्षों को पूरे भारत पर सिद्ध होते हैं?

 

मोहनन कहते हैं किए ” मानकीकृत रोगियों का प्रयोग करते हुए  किए गए हमारे पिछले अध्ययनों में शहरी दिल्ली और ग्रामीण मध्य प्रदेश से आंकड़े एकत्रित किए गए थे और देखभाल की गुणवत्ता का स्वरूप सभी में बहुत तुलनीय(समान)  है “। “मैं यह नही कह सकता कि यह देश के सभी हिस्सों में आम (पर लागू होते) बात है  लेकिन हमारे निष्कर्ष ग्रामीण भारत के लिए ज़रूर आम (लागू होते) हैं जहां अधिकतर  स्वास्थ्य सेवाएं अप्रशिक्षित चिकित्सकों द्वारा प्रदान की जाती हैं। ”

 

टिल्श  लिखते हैं कि  यह अध्ययन “एक गंभीरता  पूर्वक ध्यान देने वाला विषय  है कि सम्पूर्ण विश्व में अपर्याप्त-सेवित आबादी के लिए बाल स्वास्थ्य और जीवन  एक बड़ा , कठिन निराकरण वाला, अधूरा मुद्दा बना हुआ  है।

 

“इसे समझने की ज़रूरत है कि कैसे अधिक सुघड़ नीतियां बनाई जा सकती हैं ताकि व्यापक कार्य प्रणालियों में मौजूद नो, डू  और गुणवत्ता के अंतराल की समस्या को सुलझाया जा सके और आगे महिलाओं और बच्चों की रोकी जा सकने वाली मृत्यु के उन्मूलन के लिए महत्वाकांक्षी सतत विकास लक्ष्य तैयार किए जा सके।”

 

(समर हलर्नकर IndiaSpend.com के संपादक है)

 
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