बेंगलुरु: डेटा संग्रह की प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार ने एक स्थायी समिति (एससीओएस) का गठन किया है।

इसके गठन से पहले मार्च और जुलाई 2023 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के सदस्यों द्वारा दो रिपोर्ट्स जारी की गई थी।एक रिपोर्ट राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) की अनुमानों की गुणवत्ता की जांच करता है, वहीं दूसरे रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार, "नीति-निर्माण को बेहतर करने के लिए घरेलू डेटा एजेंसियों और सांख्यिकीय तंत्र का कायापलट करना होगा, वहीं अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के उपयोग को भी सीमित करना होगा।”

ईएसी-पीएम की सदस्या शमिका रवि लिखती हैं, “राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस), राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस), आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) को भारत की अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित करने के लिए अपने सैंपल में बड़े बदलाव करने की जरूरत है।”

बदलावों के बहस के बीच राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष पी.सी. मोहनन हमें बताते हैं कि सभी सर्वेक्षणों और जनगणनाओं में डेटा की गुणवत्ता एक बड़ा मुद्दा है और इसे प्रशिक्षण, फील्ड सुपरविजन, जागरूकता अभियान और टीम वर्क के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। उन्होंने कहा, "सहज रूप से मुझे लगता है कि जुलाई 2023 रिपोर्ट के निष्कर्ष प्रासंगिक नहीं है।"

जनवरी 2019 में एनएससी के कार्यवाहक अध्यक्ष मोहनन और एक अन्य सदस्य जे.वी. मीनाक्षी ने 2017-18 के रोजगार सर्वेक्षण को सरकार द्वारा सार्वजनिक ना करने के विरोध में इस्तीफा दे दिया था। उनका मानना है कि उनके इस्तीफे के बाद से स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। उन्होंने बताया, "एनएससी का सांख्यिकीय सुधारों में बहुत सीमित योगदान है और यह प्रभावी रूप से कार्य करे, इसके लिए कोई संसाधन भी उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।"

मोहनन अब केरल में राज्य सांख्यिकीय आयोग का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने इस साक्षात्कार में भारत की सांख्यिकीय प्रणालियों, डेटा गुणवत्ता और महत्वपूर्ण सांख्यिकीय ऑपरेशनों में सुधार लाने के लिए खुलकर बात की है।

भारत की सांख्यिकीय प्रणाली पर ईएसी-पीएम के सदस्यों की ओर से आलोचना की गई है। सरकार ने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सभी आंकड़ों की समीक्षा के लिए 2019 में आर्थिक सांख्यिकी पर गठित स्थायी समिति (एससीईएस) की जगह एक नया पैनल स्थापित किया है। आपने एनएससी के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में पद छोड़ने के तुरंत बाद मई 2019 में हमारे साथ एक साक्षात्कार में कहा था, "आयोग में प्रमुख सांख्यिकीय मामलों को दरकिनार किया जा रहा है। यह देखते हुए कि सांख्यिकीय प्रणाली में सुधार के लिए पिछली रिपोर्ट्स और आयोग मौजूद हैं तो आप सांख्यिकीय प्रणाली में सुधार के इस नवीनतम प्रयास का आकलन कैसे करेंगे? इसके अलावा 2005 में यह उम्मीद थी कि एनएससी को एक वर्ष के भीतर वैधानिक समर्थन दिया जाएगा, जो नहीं हुआ। इसके बारे में आपका क्या विचार है?

सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा वर्तमान एससीओएस के गठन में कुछ भी नया नहीं है। ऐसी समितियां हमेशा से रही हैं। एनएसएसओ के गठन के बाद से ऐसे मामलों का देखभाल आधिकारिक व गैर-आधिकारिक सदस्यों और एक स्वतंत्र गैर-आधिकारिक अध्यक्ष वाली एक गवर्निंग काउंसिल द्वारा किया जाता है। राष्ट्रीय लेखा सलाहकार समिति ने शुरू से ही राष्ट्रीय आय संबंधी कार्यों पर बारीकी से नजर रखी है। अतीत में ऐसी समितियों की सिफारिशों को बहुत गंभीरता से लिया जाता था और मंत्रालय ने शायद ही कभी उनमें हस्तक्षेप किया हो। 2005 में एनएससी के अस्तित्व में आने के बाद ऐसी समितियों की स्थापना को अधिकार माना गया और उन्हें एनएससी को रिपोर्ट करना था। हालांकि समितियां अब मंत्रालय द्वारा नियुक्त की जाती हैं और उन्हें मंत्रालय को रिपोर्ट करना होता है।

मंत्रालय द्वारा नियुक्त वर्तमान समिति के टर्म्स ऑफ़ रिफ़्रेंस (सेवा शर्तों) को देखें तो इन समितियों का मुख्य काम सर्वेक्षणों का संचालन करना है। यह भूमिका पहले एनएससी निभाती थी। इसलिए इस समिति की सर्वेक्षण करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन इससे आधिकारिक आंकड़ों में कोई बड़ा सुधार होने की अधिक संभावना नहीं है।

मेरे इस्तीफे के बाद से स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया है। एनएससी एक ऐसी संस्था है, जिसका सांख्यिकीय सुधारों में बहुत सीमित योगदान है और इसके प्रभावी कामकाज के लिए इसे कोई संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

ईएसी-पीएम की जुलाई 2023 का एक पेपर एनएसएस में डेटा गुणवत्ता की समस्या को उजागर करने की कोशिश करता है। इसमें ग्रामीण आबादी का अनुपात, अनुसूचित जाति आबादी का अनुपात और कामकाजी उम्र (15 से 59 वर्ष) की जनसंख्या का अनुपात तीन प्रमुख विषय हैं। तर्क दिया जाता है कि अगर सैंपल साइज बढ़ेंगे तो भी बढ़ा हुआ डेटा गुणवत्ता से संबंधित मुद्दों का समाधान नहीं कर सकता है। एनएसएस सर्वेक्षणों में डेटा गुणवत्ता की समस्या कितनी महत्वपूर्ण और विकट है?

सभी सर्वेक्षणों और जनगणनाओं में डेटा गुणवत्ता एक बड़ा मुद्दा है। ये मुद्दे बहुत वास्तविक हैं और बदलती जीवनशैली, पारिवारिक सेटिंग और आर्थिक गतिविधियां इसे और अधिक कठिन बना सकती हैं। इन्हें कई पारंपरिक तरीकों से संबोधित किया जाता है, जैसे- प्रशिक्षण, फील्ड सुपरविजन, जागरूकता अभियान, टीमवर्क, पुनर्निरीक्षण आदि। ईएसी-पीएम का पेपर इस मुद्दे को एक अलग तरह के सैद्धांतिक संदर्भ में पेश करता है। जिस कार्य पर उनका पेपर आधारित है, वह 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और उभरते हुए डेटा परिदृश्य के संदर्भ में है। एनएसएसओ सर्वेक्षण सीधे ग्रामीण आबादी के प्रतिशत या एससी/एसटी लोगों की जनसंख्या या कामकाजी उम्र की आबादी के अनुपात का अनुमान लगाने के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए हैं। ये परोक्ष रूप से सर्वेक्षण डेटा से प्राप्त होते हैं। उपयोगकर्ता इसे इस्तेमाल करते समय इसकी सीमाओं को अच्छी तरह से जानता है।

सर्वेक्षण का पर्याप्त और विस्तृत कवरेज सुनिश्चित करने के लिए डेटा कलेक्ट किए जाने से पहले जनसंख्या को जिलों, गांवों और घरों के स्तर पर बांटा जाता है। एनएफएचएस जैसे सभी राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में इस दृष्टिकोण का पालन किया जाता है। ये बहु-विषयक सर्वेक्षण हैं, जो चुनावी सर्वेक्षण के विपरीत बड़ी संख्या में कई पहलूओं को कवर करते हैं। सर्वेक्षण का सैंपल साइज यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि प्रमुख आयामों का अनुमान राज्य या यहां तक कि जिला स्तर पर लगाया जा सके। एनएसएसओ प्रमुख संकेतकों के लिए सर्वेक्षण-आधारित त्रुटियों का मार्जिन (संभावित त्रुटि) प्रकाशित करता है, जिसे डेटा उपयोगकर्ताओं को सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर टिप्पणी करने से पहले देख लेना चाहिए।

आमतौर पर अकादमिक हलकों में बहस के लिए किसी को भी ऐसे शोध [ईएसी-पीएम के जुलाई 2023 के पेपर का संदर्भ देते हुए] की उम्मीद होगी।

जनगणना में अनुसूचित जाति की जनसंख्या के आकलन पर आपकी विशिष्ट टिप्पणी क्या है? पेपर में कहा गया है कि इससे घरेलू उपभोग व्यय को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा सकता है क्योंकि जनगणना में ग्रामीण और एससी आबादी को अधिक बताया गया है। जनगणना और एनएसएस की तुलना करने में क्या दिक्कत है?

एनएसएसओ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं बल्कि जिले में ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग स्तर पर सैंपल तैयार करता है। मेरे लिए ईएसी-पीएम पेपर ऐसा है कि जैसे वे सभी पहलुओं के लिए एक सैंपल तैयार कर रहे हैं।

एनएसएस का उद्देश्य शहरी या ग्रामीण आबादी का अनुमान लगाना नहीं है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों का निर्धारण सर्वेक्षण की तिथि पर उपलब्ध सीमांकन के आधार पर किया जाता है। एनएफएचएस और एनएसएस में सभी अनुमान विभिन्न वैरिएबल्स [घरों] के प्रतिशत या अनुपात के रूप में हैं। ग्रामीण और शहरी आबादी की सही संख्या उपलब्ध नहीं है। उपयोगकर्ता इन अनुमानों को शहरी और ग्रामीण आबादी के अनुमानों से उपलब्ध संख्याओं के आधार पर लागू करते हैं।

लेकिन एससी और एसटी आबादी के लिए अन्य मुद्दे भी हैं। जनगणना कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण का उपयोग करती है। वे जांचते हैं कि क्या जाति या जनजाति राज्य में सूचीबद्ध है और यदि वे सूचीबद्ध नहीं है तो आपको एससी या एसटी के रूप में शामिल नहीं किया जाएगा। लेकिन एनएसएस इसे स्पष्ट रूप से जवाब देने वाले उत्तरदाता के जवाब के आधार पर रिकॉर्ड करता है। इसलिए जनगणना, एनएसएस की तुलना में थोड़ा कम अनुमान दे सकती है। इसका सैंपलिंग प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं है।

जनगणना के दौरान शहरी और ग्रामीण क्षेत्र को वर्गीकृत करने में क्या-क्या चुनौतियां हैं?

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की एक मानक परिभाषा और विशिष्ट भौगोलिक सीमांकन है। राज्य सरकार किसी क्षेत्र को नगर पालिका, नगर निगम या नगर पंचायत (कस्बे) के रूप में अधिसूचित कर सकती है। जो क्षेत्र कस्बे के मानकों को पूरा करते हैं, उन्हें जनगणना और अन्य सर्वे में शहरी क्षेत्र कहा जाएगा। शहरी और गैर-शहरी क्षेत्रों के बीच कोई भ्रम नहीं है। दिक्कत तब आती है जब किसी क्षेत्र को नया शहरी क्षेत्र बनाया जाता है। एनएसएस के लिए इन क्षेत्रों की तुरंत पहचान करना संभव नहीं है। सीमाओं और शहरी फ़्रेम का मानचित्र तैयार करने के लिए कम से कम एक साल या उससे अधिक का समय लगता है।

ईएसी-पीएम पेपर ने 2011 के एनएसएसओ डेटा की तुलना 2001 की जनगणना से की है, जिसमें 68वें दौर के लिए शहरी चित्रण का उपयोग किया गया था। यह एक और कारण है कि शहरी डेटा को कम करके आंका जाता है। शहरी के लिए यह अनुमान लगभग 18% और ग्रामीण के लिए 6% है। इसके अलावा जनसंख्या का अनुमान औसत घरेलू आकार और कुल परिवारों की संख्या के रूप में लगाया जाता है। जनगणना और एनएसएस में घरों की संख्या आम तौर पर समान है, लेकिन एनएसएस में औसत घरेलू आकार कम होता है, इसलिए एनएसएस में जनसंख्या के भी कम होने का अनुमान हो सकता है।

सहज रूप से मुझे लगता है कि यह निष्कर्ष हमारे संदर्भ में प्रासंगिक नहीं है। जैसा कि मैंने कहा कि एनएसएस में जिला स्तर पर ही कई सैंपल और वैरिएबल्स होते हैं। किसी एक वैरिएबल के लिए सैंपल साइज निर्धारित करना संभव नहीं है। रोजगार के लिए जो सैंपल साइज है, वह बेरोजगारी के लिए लागू नहीं हो सकता है। इस पेपर में जिस तरह का सरलीकरण किया गया है, वह मुझे ठीक नहीं लगा।

ईएसी-पीएम के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने लिखा था कि जनगणना और सर्वेक्षण दोनों के प्रश्नावली को सुव्यवस्थित और सरल बनाया जा सकता है ताकि इसे 20 मिनट में ही पूरा किया जा सके। कितने लोगों के पास उस प्रश्नावली का उत्तर देने के लिए समय और रुचि है, जिसे पूरा करने में दो घंटे लगते हैं? क्या यह संभव है या क्या इसे जमीनी स्तर पर हासिल किया जा सकता है?

किसी परिवार को सर्वेक्षण उद्देश्य समझाने और उसकी बुनियादी डेटा की पहचान करने में आमतौर पर 20 मिनट ही लगते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि यह दो घंटे वाली बात कहां से आई? ऐसा लगता है कि मैदान पर इसे अलग ढंग से उतारा जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तरदाता सर्वेक्षण के लिए समय नहीं देते और उनसे सहयोग की गॉरंटी भी नहीं ली जा सकती है।

सर्वेक्षण लागत और एकत्र किए जाने वाले डेटा का संतुलन जरूरी है। तकनीक अपनी जगह है, लेकिन डेटा को पहले व्यक्तिगत संपर्क और संवाद के माध्यम से सुनिश्चित करना होगा। डेटा संग्रह से पहले उत्तरदाताओं के साथ संबंध बनाने में समय लगता है और इसे 20 मिनट में नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण भारत में अधिकांश सर्वेक्षण घर के दायरे में गोपनीयता के साथ नहीं किए जा सकते हैं। विभिन्न सर्वेक्षण परिवेशों से निपटने के लिए सर्वेक्षणकर्ताओं को चतुराई और अनुभव की आवश्यकता होती है। इस तरह के बयान सर्वेक्षणकर्ताओं के कठिन मेहनत के साथ न्याय नहीं करते हैं।

जुलाई 2023 की नीति आयोग की राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) ने एनएफएचएस डेटा का उपयोग करके पाया है कि 2015-16 और 2019-21 के बीच लगभग 136 मिलियन लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंकड़ों (32.6% से 19.3%) के आधार पर यह गरीबी के प्रतिशत में सबसे तेज़ गिरावट थी। रिपोर्ट के निष्कर्षों पर आपका क्या कहना है?

यह दिलचस्प है कि नीति आयोग की उसी सर्वेक्षण डेटा का उपयोग करके बहुआयामी गरीबी में सबसे तेज़ गिरावट का पता लगाता है, जिसमें ईएसी-पीएम को गलती मिलती है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक कुछ हद तक संकेतकों के चुनाव पर भी निर्भर करता है और ये संकेतक सार्वभौमिक नहीं होते है। हाल के वर्षों में बैंकिंग, पेयजल, स्वच्छता, आवास आदि जैसे संकेतकों में काफी सुधार हुए हैं और सूचकांकों में उनकी उपस्थिति समग्र सूचकांक में भी सकारात्मक रूप से दृष्टिगोचर होती है।

एनएफएचएस का लाभ यह है कि सभी प्रासंगिक जानकारी एक ही घर से एकत्र की जाती है। दो या तीन सर्वेक्षणों के डेटा को क्लब करने से एमपीआई की गणना मुश्किल हो जाएगी। एमपीआई के लिए एनएफएचएस का उपयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। विडंबना यह है कि एनएफएचएस की आलोचना की जाती है।

फ़िलहाल गरीबी को परिभाषित करने के लिए हम आय या व्यय आधारित मानकों का उपयोग कर रहे हैं। एमपीआई संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम का एक नवाचार है। आय-व्यय की तुलना में यह डेटा एकत्र करना आसान है। वास्तविक गरीबी संकेतक आय या व्यय आधारित ही होना चाहिए, लेकिन मुझे एमपीआई का उपयोग करने में भी कोई गुरेज नहीं दिखता है। हालांकि कोई भी एमपीआई में उपयोग होने वाली मानकों पर सवाल उठा सकता है।

सरकार का कहना है कि वह एनएसओ डेटा के बारे में चिंतित है, लेकिन जनगणना प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं हुई है। कानूनी तौर पर सरकार यह तय कर सकती है कि वह कब जनगणना कराना चाहती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से सभी सर्वेक्षण पुरानी 2011 की जनगणना पर ही निर्भर करते हैं और डेटा की कमी, नीति निर्माण पर गंभीर प्रभाव डालता है। आपकी इस पर क्या टिप्पणी है?

भारत में जनगणना का संचालन गृह मंत्रालय के नियंत्रण में होता है, वहीं अधिकांश देशों में जनगणना राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालयों की जिम्मेदारी है। कई सरकारी योजनाओं के लाभार्थी अनुमानित जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर ही निर्धारित होते हैं। अगर आप सही समय पर जनगणना नहीं कराते हैं तो नए आंकड़ों की कमी का गंभीर प्रभाव नीति निर्माण पर पड़ता है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, हमारी अधिकांश बहसें और नीति अनिश्चित साक्ष्यों पर आधारित होंगी।

जनगणना के आंकड़ों के स्पष्ट राजनीतिक उपयोग भी हैं। राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर या राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जैसे प्रशासनिक रजिस्टर तैयार करने के लिए जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने का विचार भी चिंता का विषय है क्योंकि इससे जनगणना डेटा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। हालांकि सरकार को जल्द से जल्द अगली जनगणना के आयोजन को लेकर स्थिति साफ करनी चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा विकास संकेतकों के अनुमानों की पुनः जांच करने वाले मार्च 2023 के ईएसी-पीएम पेपर के जवाब में आपने लिखा था कि डेटाबेस का अधिक उद्देश्यपूर्ण मूल्यांकन सांख्यिकीय प्रणाली को बेहतर बनाने में मदद करेगा। इसके अलावा सीएजी जैसा एक स्वतंत्र कार्यालय और नियामक बनाने का भी सुझाव दिया गया है ताकि सांख्यिकीय प्रणाली की सर्वोच्च संस्था सरकार पर निर्भर न रहे और राजनीति से प्रभावित न हो। आपकी राय में वैधानिक समर्थन के साथ एक सांख्यिकीय निकाय बनाना कितना संभव है, यह देखते हुए कि सांख्यिकी पर एक स्थायी समिति का गठन किया गया है और एनएससी के पास वैधानिक समर्थन नहीं है?

कार्नेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस फाउंडेशन के प्रमित भट्टाचार्य के एक हालिया अध्ययन में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है और भारत के लिए एक सांख्यिकीय सुधार आयोग की आवश्यकता के बारे में भी बात की गई है। एनएससी के गठन सहित अब तक के सुधार आधे-अधूरे थे। सिस्टम को जनशक्ति और वित्त पोषण दोनों के संदर्भ में संस्थागत पुनर्गठन करने की आवश्यकता है। लोगों को उम्मीद है कि ईएसी-पीएम इन मुद्दों को समझेंगे और उनका समाधान करेंगे, जिससे सांख्यिकीय प्रणाली को भी मदद मिल सकती है।

हमारे पास देश में अत्यधिक विकेंद्रीकृत सांख्यिकीय प्रणाली है। एक मजबूत और प्रभावी तकनीकी शीर्ष निकाय ही अब मंत्रालयों और राज्यों में फैले सांख्यिकीय संचालन को नियंत्रित कर सकता है। कई राष्ट्रीय स्तर की जनगणनाओं सहित कुछ सांख्यिकीय परिचालनों ने वास्तव में अपनी उपयोगिता खो दी है। कृषि या आर्थिक जनगणना जैसी विभिन्न प्रकार की जनगणनाएं महंगी प्रक्रियाएं हैं। हमें इसका मूल्यांकन करना होगा कि क्या वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें इन्हें संचालित करने की आवश्यकता है? कृषि जनगणना 1950 के दशक में शुरू हुई जब कृषि जोत या भूमि वितरण से संबंधित शायद ही कोई डेटा था। हमें यह निर्णय लेने की आवश्यकता है कि क्या हमें ऐसे क्षेत्रों में जनगणना की आवश्यकता है या एक बड़ा नमूना सर्वेक्षण ही पर्याप्त होगा। इन परिचालनों की उपयोगिता का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने की आवश्यकता है।

फ़िलहाल बड़े प्रशासनिक डेटाबेस को एकीकृत करने और उन्हें सांख्यिकीय प्रणाली का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए बेहतर मेटा-डेटा प्रबंधन प्रथाओं की जरूरत है। पर्याप्त संसाधनों और विशेषज्ञता वाला एक सशक्त शीर्ष निकाय इस परिवर्तन के लिए सही वातावरण प्रदान कर सकता है। टुकड़ों में होने वाले सुधारों से मदद मिलने की कोई संभावना नहीं है। अपने वर्तमान स्वरूप में स्थायी समिति या एनएससी चुनौती का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

डेटा पर हो रही आलोचनाओं को अधिक निष्पक्षता से हल करने में भी एक शीर्ष निकाय मदद कर सकता है।

क्या आपको लगता है कि इन सभी परिचालनों को सांख्यिकीय कार्यों के लिए एक वैधानिक निकाय के तहत विलय कर दिया जाना चाहिए या क्या संबंधित विभागों को इसे संभालना चाहिए?

वर्तमान में जनगणना गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी है, जबकि कृषि विभाग जैसे संबंधित विभाग कृषि जनगणना का काम संभालते हैं। यहां आवश्यकता एक कुशल और किफायती सांख्यिकीय प्रणाली की है, जो सभी संचालन एक नोडल सांख्यिकीय एजेंसी के नियंत्रण में होने चाहिए। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में जनगणना सांख्यिकी कार्यालय द्वारा आयोजित की जाती है।

यदि हमारे पास वित्तीय और मानव संसाधनों सहित वैधानिक समर्थन वाला एक सशक्त सांख्यिकीय आयोग है, तो अधिकांश कार्यों को इसके दायरे में लाया जा सकता है। यह तय किया जा सकता है कि इसका स्वरूप सीएजी जैसा होगा या चुनाव आयोग जैसा अन्यथा मंत्रालय वैसे ही संचालन जारी रखेंगे क्योंकि उनके पास व्यवस्था और कर्मचारी दोनों मौजूद हैं।

आप केरल में राज्य सांख्यिकी मिशन का नेतृत्व कर रहे हैं। आपके एनएससी अनुभव के आधार पर राज्य सांख्यिकीय प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए किन-किन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित किया गया है? ऐसे समय में जब गैर-प्रशासनिक स्रोतों सहित विभिन्न स्रोतों से अधिक से अधिक डेटा उपलब्ध हो, राज्यों की क्या भूमिका होनी चाहिए?

अधिकांश राज्यों में सांख्यिकीय प्रणाली उपेक्षा और संसाधनों की कमी से ग्रस्त है। राज्य सांख्यिकीय प्रणालियां केवल एक माध्यमिक भूमिका निभाती हैं और मार्गदर्शन व ज्यादातर मामलों में वित्त पोषण के लिए केंद्रीय एजेंसियों पर निर्भर होती हैं। कुछ सांख्यिकीय गतिविधियां जो राज्य एजेंसियों की ओर से होते हैं, वे राज्यों के लिए विशेष रूप से उपयोगी नहीं हैं।

अगर उदाहरणों से समझा जाए तो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का संकलन किसी राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के वित्तीय प्रदर्शन इससे जुड़े होते हैं। कई वित्त आयोगों ने जीएसडीपी अनुमान में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया है। जीएसडीपी संकलन के लिए राज्यों द्वारा उपयोग किए जाने वाले डेटा का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में एनएसओ द्वारा प्रदान किया जाता है। एनएसओ द्वारा आपूर्ति की गई डेटा में से कई ऐसे डेटा होते हैं, जो जरूरी नहीं कि राज्यों द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों पर आधारित ही हों। ये अक्सर पुरानी हो चुकी डेटा होती हैं। ऐसे संकेतकों को राज्य-स्तरीय सर्वेक्षणों के माध्यम से नया किया जा सकता है, लेकिन राज्यों के पास राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

दुर्भाग्य से एनएसएसओ या सीएसओ या किसी केंद्रीय मंत्रालय के आंकड़ों के विपरीत राज्य स्तरीय डेटा की अधिक उपयोगिता नहीं है। राज्य स्तरीय डेटा का उपयोग करके अधिक शोध नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह भी है कि राज्य स्तरीय एजेंसियों पर उनके द्वारा एकत्र या प्रकाशित किए जाने वाले डेटा की गुणवत्ता में सुधार करने का अधिक दबाव नहीं है।

आम तौर पर कोई यह उम्मीद करेगा कि राष्ट्रीय डेटा पंचायत या शहरी निकाय जैसे निचले स्तरों पर उत्पन्न डेटा का एक समूह होगा, जो ब्लॉक, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एकत्र किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। यहां तक कि जहां राज्य पूरी तरह से जिम्मेदार है, वहां भी केंद्रीय एजेंसियों की मंजूरी जरूरी है। यह एक हद तक यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी भी है कि राज्य स्तरीय एजेंसियां गुणवत्ता मानकों को पूरा कर रही हैं या नहीं।राज्य स्तरीय डेटा को कुछ बाहरी जांचों से भी गुजरना पड़ता है क्योंकि राज्यों के पास अपनी डेटा की जांच करने के लिए कोई स्वायत्त एजेंसी नहीं है। लेकिन ये सभी प्रक्रियाएं राज्य एजेंसियों को अधिकांश क्षेत्रों में डेटा की पूर्ति के लिए पूरी तरह से केंद्रीय एजेंसियों पर निर्भर बनाती हैं।

राज्य स्तरीय डेटा एजेंसियों की प्रणालियों में आमूलचूल बदलाव और उनकी प्राथमिकताओं को नये सिरे से तय करने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में कुछ मौजूदा गतिविधियों को कम किया जा सकता है और उनके स्थान पर नई गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं। हालांकि अधिकांश राज्यों में अच्छी आईटी सुविधाएं और क्षमता हैं, लेकिन धन की कमी के कारण हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की उपलब्धता अपर्याप्त है। मेरी राय में राज्यों को जिन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए वे हैं- (1) जीएसडीपी अनुमान में सुधार, (2) सर्वेक्षण क्षमता को मजबूत करना और (3) प्रशासनिक डेटा का बेहतर उपयोग।

सार

भारत में सर्वेक्षणों से प्राप्त सरकारी डेटा की गुणवत्ता पर गहरी बहस छिड़ी हुई है। जुलाई 2023 में,सरकार ने डेटा संग्रह को बेहतर बनाने के लिए एक नई समिति का गठन किया। भारत के राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष पीसी मोहनन कहते हैं, “सभी सर्वेक्षणों और जनगणनाओं में गुणवत्ता के मुद्दे हैं, लेकिन उन्हें पारंपरिक तरीके से प्रबंध करने की आवश्यकता है।” एक साक्षात्कार में उन्होंने डेटा ऑपरेशन की उपयोगिता का गंभीर रूप से पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर बल दिया और भारत की सांख्यिकीय प्रणालियों में सुधार के लिए किए जाने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डाला।